मुक़म्मल ग़ज़ल.....
किसलिए डरता है सीने से लगा ले मुझको ।
ख़्वाब हूँ उसका तो पलकों पे सजा ले मुझको ।
जो करे आज करे कल पे न टाले मुझको ।
उससे कह दो के यूँ उलझन में न डाले मुझको ।
सिर्फ़ दो बोल मुहब्बत के हैं क़ीमत मेरी ,
जिसका जी चाहे वही अपना बना ले मुझको ।
इस क़दर तारी मुहब्बत का नशा है मुझ पर ,
गिर न जाऊँ मैं कहीं आ के सँभाले मुझको ।
रात-दिन सिर्फ़ इसी ख़ौफ़ में जाँ जाती है ,
हिज़्र ये उसका कहीं मार न डाले मुझको ।
पहले तो अपनी जफ़ाओं से किया ख़ुद रुस्वा ,
और अब देता है उल्फ़त हवाले मुझको ।
अपने पैकर में बहुत ख़ुश हूँ मैं 'नादान' कोई ,
अब नए और किसी साँचे में न ढाले मुझको ।
राकेश 'नादान'
