'कोई विकल्प नहीं है तुम्हारे अपनेपन से भरे स्पर्श का| लेकिन खुले में धीमी .........

in #poem4 years ago



'कोई विकल्प नहीं है तुम्हारे अपनेपन से भरे स्पर्श का| लेकिन खुले में धीमी हवा को छूते हुए बीत ही जाती हैं बसंत की शामें|

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