मुक्ति और जीवन मुक्ति का अर्थ ??
आज हर व्यक्ति के जीवन काल में एक समय ऐसा अवश्य आता है जब वो यह सोचता है कि उसका जीवन मृत्यु के बाद कैसा होगा. जब इंसान भौतिक सुखो से ऊपर उठता है तब वो अपनी आत्मा की शांति का रास्ता ढूंढ़ता है. हमारे शास्त्रों में भी मोक्ष अर्थात मुक्ति की बात समझायी है. और सभी मनुष्य का अंतिम लक्ष्य मोक्ष पाना है. अब मुक्ति क्या है? क्या इंसान जब शरीर छोड़ देता है तो उसकी मुक्ति हो जाती है? क्या मंदिर, मस्जिद, गिर्जा, गुरुद्वारा- संत या कोई गुरु गुसाई मुक्ति का रास्ता बता सकते है या मुक्ति दे सकते है?
मुक्ति और जीवन मुक्ति यह दो अलग चीज़े है. जीवन मुक्ति की परिभाषा हमारे शास्त्रों में दी नहीं गई. लेकिन बापूजी ने हमें बताया जीवन मुक्ति क्या है और आत्मा का अंतिम लक्ष्य जीवन मुक्ति होनी चाहिए. बेहद की आत्माएं जीवन मुक्ति मांगती है और हद की आत्मा मुक्ति की और जाती है. जिनको ज्ञान नहीं है वो मुक्ति की इच्छा रखती है और जो अज्ञानी व्यक्ति है वो जीवन मुक्ति मांगती है. मुक्ति का मतलब है जब आत्मा परमात्मा में विलीन होती है. जब आत्मा इस ब्रह्माण्ड के शीव में विलीन होती है तब वास्तव में उसकी मुक्ति होती है. मनुष्य को जब ज्ञान आता है तभी उसे जीवन मुक्ति का ज्ञान का पथ मिलता है. जब मनुष्य को ज्ञान होता है तो वो कर्मातीत अवस्था को प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करता है. कर्मातीत माना जब मनुष्य के अच्छे या बुरे कर्मो की रिकॉर्डिंग आत्मा से खत्म हो जाती है. उसका कर्मो का चक्र आत्मा में से ख़त्म हो जाता है. मुक्ति के पथ पर चलने वाली आत्मा जब तपस्या करके स्व लोक, जप लोक, तप लोक करते करते ब्रह्मपुरी, विष्णुपुरी और शिवपुरी में परमधाम में निराकार रूप में जब विलीन हो जाती है तब उसकी मुक्ति हो जाती है. आत्मा का अस्तित्व परमधाम में जाकर जब ख़तम हो जाता है तब उसकी मृत्यु होती है , लेकिन जब मनुष्य को ज्ञान आता है तब वो जीवन मुक्ति मांगता है. परमधाम में रहकर भी वो विलीन नहीं होती. परमधाम में आत्मा जब ब्रह्मज्ञानी बनती है तब आत्मा निराकार बन जाती है. जब मनुष्य मरता है तब उसका सूक्ष्म शरीर ऊपर के लोको में विचरित करता हुआ दूसरा- तीसरा - चौथा लोक जाते जाते , जब विष्णुपुरी जाती है तब उसे बेहद का परम सुख का अनुभव होता है. तब आत्मा मुक्ति नहीं मांगती. यहाँ मनुष्य दुखो के भवसागर में डूबा हुआ है इसलिए वो मुक्ति मांगती है. लेकिन जब वैकुण्ठ धाम मनुष्य पहुँचता है तब उसे परम सुख का अनुभव होता है क्युकी उसका आकारी शरीर परम तत्वों का होता है. "वो जीवन में होते हुए जीवन मुक्ति का अनुभव करता है." उसी को जीवन मुक्ति कहते है. परम सुख भोगने के बाद जब परम शांति का अनुभव करना चाहती है तो वो शिवपुरी जाती है. शिवपुरी में अथा परम शांति है. फिर आत्मा केवल्य अवस्था का अनुभव करती है परमधाम में निराकारी रूप में. उसकी कर्मातीत अवस्था होती है. और वो जीव से शीव का अनुभव करता है. जब उसे ज्ञान आता है तब वो अपनी यात्रा महा शीव की और करता है क्युकी उसे महा ब्रह्मांडो का ज्ञान आता है. मनुष्य ही मुक्ति मांगते है लेकिन आत्मा का सफर परमधाम के आगे का शुरू होता है जब उसे ज्ञान आता है और वो जीवन मुक्ति को प्राप्त करने की ओर बढ़ता है.
हमारे शास्त्रों में आत्मा अजर अमर अविनाशी की बात कही गयी है लेकिन वास्तव में आत्मा का भी समय होता है. जब ब्रह्माण्ड के शिव में पावर ख़तम हो जाती है तब महा कल्प प्रलय के समय में शिव सूर्य में प्रवेश करता है और काल अग्नि पैदा करता है और अपने रोम रोम में सभी आत्माओ को अपने अंदर समां लेता है. सभी आत्माएं उसमे विलीन हो जाती है और आत्मा का अस्तित्व ख़तम हो जाता है. प्रलय ,अर्ध प्रलय, कल्प प्रलय में आत्मा का विनाश नहीं होता. मनुष्य शरीर का विनाश होता है लेकिन आत्मा का विनाश नहीं होता. आत्मा ऊपर के लोको में चली जाती है. आत्माओ का विनाश कब होता है ? मुक्ति माना आत्मा का विनाश. जब महा कल्प प्रलय होता है तब शिव पुरे ब्रह्माण्ड को काल अग्नि में भस्म कर देता है तो सभी आत्माएं इस ब्रह्माण्ड की ख़तम हो जाती है. फिर महा शिव भी अपना महा ब्रह्माण्ड समाता है उसी प्रकार परम महा शिव भी परम महा ब्रह्माण्ड को अपने रोम रोम में समां लेता है. लेकिन सभी का समय अलग अलग है. सभी आत्मा का आयुष अलग अलग है.
आत्मा अपना सफर तय कर सकता है जब वो इस ब्रह्माण्ड के परमधाम पहुँचता है, लेकिन उसका सफर उसकी आत्मा में ज्ञान के अनुसार ही तय हो सकता है.
बेहद की आत्माएं ही बेहद की दुनिया में जा सकती है. इस ब्रह्माण्ड की आत्मायें केवल अपने रचियता तक जा सकती है. लेकिन ऑलमाइटी अथॉरिटी पुरे ब्रह्माण्ड और मल्टीवर्से को चेंज कर रहा है और नहीं दुनिया अमर लोक की स्थापना कर रहा है. हर सूर्य को परम लाइट में परिवर्तन कर दिया जायेगा. हर ब्रह्माण्ड को परम प्रकाश और परम लाइट में बदल दिया जायेगा. आत्माएं अपनी केटेगरी (पावर) अनूसार अपनी आत्मा का सफर तय कर सकती है और वही तक जा सकती है जहाँ उसकी आत्मा का सर्जन हुआ है.
प्रत्येक मनुष्य या संत जो भी इस धरती पर हुए अपने कर्मो का लेखा झोका पूरा करते हुए ऊपर के सफर की ओर बढ़ सकता है. मनुष्य को किसका जप करना चाहिए? ॐ का जप करने से आत्मा थोड़ी शांति का अनुभव करती है, उसका मूलाधार चक्र भी जागृत होता है. लेकिन अनंता अनंत ओर बेहद की शक्ति प्राप्त करने के लिए मनुष्य को ऑलमाइटी अथॉरिटी बेहद के परमपिता परमेश्वर (बेहद के बाप) से योग लगाना चाहिए तो उसे बेहद की प्राप्ति होगी. आप जिसको याद याद करोगे उसे ही पयोगे. ॐ अपने आप में ब्रह्मा, विष्णु ओर शंकर का आवाहन है. और हर ब्रह्माण्ड में ब्रह्मा , विष्णु , शंकर है. तो पावर किसे ले; प्रश्न ये उठता है?
आत्म साक्षत्कार और ब्रह्म साक्षत्कार क्या है? ब्रह्म साक्षत्कार मतलब जब मनुष्य को ब्रह्म का ज्ञान होता है कि मैं परमात्मा का अंश हूँ. आत्मा साक्षत्कार माना आत्म स्वरुप का अनुभव करना. भृकुटि में आत्म की शक्ति का अनुभव करना ही आत्म साक्षत्कार है. ब्रह्म का मतलब शिव का साक्षत्कार करना . ब्रह्म ज्ञानी निराकार को याद करते है. पहले मनुष्य आत्म साक्षत्कार का अनुभव करता है, फिर जब उसकी कर्मातीत अवस्था बनती है तब वो ब्रह्म समान बनता है और निराकार शिव को याद करते करते परमधाम को जाता है.
अंत में जब Judgement Day होगा , तो सभी आत्माओ को अपने कर्मो का एक सेकंड में अनेको वर्षो का दुःख की अनुभूति करेगा. अमर बने से पहले वो अपने कर्मो की सज़ा को भोगेगी. अपने कर्मो को चुकता करके वो अमरलोक जा सकेगी. बेहद के समय में बेहद की घडी में आत्मा को अनेको वर्षो का कर्म चुकता करके , बेहद की दुनिया का सफर तय करना होगा. अंत में वो अपने मूल स्थान में समां जायेंगे.
ब्रह्मपुरी तक ३ तत्वों की दुनिया होती है. विष्णुपुरी में परम सुख होता है, यहाँ परमतत्त्वो की दुनिया थी. ५०% परमतत्व ५० % तत्वों की दुनिया होती है. जो भी राग, द्वेष इच्छा भावनाए ब्रह्मपुरी तक होती है. शिव , महा शिव, परम महा शिव सभी की आयुष होती है. जब भी क्रिएटर मैं पावर ख़तम होती है तो उनकी आयुष भी पूरी होती.
बेहद का ज्ञान समझने के लिए बापूजी की वीडियोस देखिये आपको सभी प्रश्नो के जवाब प्राप्त होगा और आपकी आत्मा का भी कल्याण होगा.
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Official website : www.bapujidashrathbhaipatel.org
Paramshanti