Thakur ki kahani
क्षत्रिय (KSHATRIYA) धर्म || “क्षति से जो समाज की रक्षा करता है ; वही क्षत्रिय (KSHATRIYA) कहलाता है|” वैदिक सनातन धर्मं में क्षत्रिय (KSHATRIYA) धर्म का एक महत्वपूर्ण स्थान है| महर्षि याश्क ने अपने ग्रन्थ ‘निरुक्त’ में क्षत्रिय (KSHATRIYA) शब्द का अच्छा विवेचन किया है| वे कहते है , “क्षतात त्राय ते इति क्षत्रिय (KSHATRIYA): ” अर्थात क्षति (याने पाप, अधर्म, कष्ट, शत्रु आदि सर्व प्रकार की क्षति) से रक्षा करना सच्चे क्षत्रिय (KSHATRIYA) का परम कर्त्तव्य होता है| महात्मा मनु ने भी प्रजाओं का पालन ही क्षत्रियों का श्रेष्ठ धर्मं बतलाया है | (आधार: मनुस्मृति: अध्याय ७, श्लोक क्रमांक १४४)
क्षत्रिय (KSHATRIYA) के स्वाभाविक कर्म के बारे में भगवन श्री कृष्ण ने श्रीमद भगवद्गीता में कहा है की शूरवीरता ,तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागने का स्वभाव एवं दान और स्वामिभाव ये सब क्षत्रिय (KSHATRIYA) के स्वाभाविक कर्म है |
राजस्थान के रजवट साहित्य में भी क्षत्रिय (KSHATRIYA) धर्म का सुन्दर चित्रण मिलता है|
Rajputana
क्षत्रिय (KSHATRIYA) सुख,भोग की लालसा नहीं रखता है| वह तो संघर्ष का अधिकारी होता है| जो सुख या भोग के प्रति शरण जाते है, वे क्षत्रिय (KSHATRIYA) नहीं होते है| क्षत्रिय (KSHATRIYA) केवल जाती नहीं, केवल धर्मं नहीं बल्कि एक व्रत है, जिसे जीवन भर हमें समर्पित होना चाहिए, समर्पण के भाव से जीना चाहिए| क्षत्रिय (KSHATRIYA) की आँख एक-दुसरे में फर्क नहीं करती है| पुराण कालीन क्षत्रिय (KSHATRIYA) सभी जनता को एक ही दृष्टी से देखते थे| क्षत्रिय (KSHATRIYA) हमेशा न्याय के पक्ष में रहता है|