प्रकृति की ओर... जिंदगी की डोर

in #lifelast year

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आज अधिकांश मनुष्य विचारों के जंजाल में उलझे हुए हैं। इस समय सभी को आत्मपरीक्षण की जरूरत है। विचारों को परख कर उनमें से लाभकारी विचार सहेजें। उलझन बढ़ाने वाले विचारों का शमन करें। यह कार्य नियमित करें। इससे चमत्कारिक परिणाम मिलेंगे। विचारों के उद्वेलन से छूटने के लिये प्रकृति की दिनचर्या पर ध्यान लगाएँ। देखें कि कैसे सुबह से शाम तक प्रकृति अपना दिन गुजारती है। वृक्षों के बारे में सोचें। अपने जीवन के लिये उनकी प्राकृतिक उपयोगिता का विचार करें।
भौतिक जगत में जीवन बुरी तरह भाग रहा है। मनुष्य अपने स्वभाव से विपरीत दिशा की ओर अग्रसर है। वह अपनी प्रकृति से प्रतिपल विमुख हो रहा है। यह सोचने-समझने का अवसर भी नहीं मिल पा रहा कि इतनी भागदौड़ का अन्तिम हासिल क्या है? जीवन के बारे में समुचित चिन्तन करना अच्छी बात है, पर प्रतियोगी और प्रतिस्पर्धा बन विचार पर विचार चढ़ाना और किसी एक विचार के क्रियान्वयन से लाभान्वित होने से हमेशा वंचित रह जाना, यह द्वैत है। इससे कुंठा बढ़ती है और मानसिक सन्तुलन बिगड़ता है। जिस तरह घर की साफ-सफाई करने के बाद हम अनावश्यक सामान को छाँटकर फेंक देते हैं, यदि उसी प्रकार विचारों के घर की भी प्रतिदिन सफाई कर अनावश्यक विचारों को फेंक दें तो हमारे जीवन पर बहुत सुखद असर होगा।

पशु-पक्षियों से संसाधन विहीन होकर जीना सीखें। पेड़-पौधों से परोपकार के लिये स्वावलम्बी स्वभाव का ज्ञान पाएँ। यह सब तभी सम्भव है, जब ह रुककर जीवन के बारे में नियत दिनचर्या से अलग होकर कुछ सोचें-विचारें। वास्तव में यही आत्म साक्षात्कार की प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया हमें स्वयं स्वाभाविक रूप से आत्मसात करनी होगी। निःसन्देह इस विचार-पथ की यात्रा अत्यन्त आनन्ददायक होगी। फलस्वरूप भौतिक जगत से भी हम एक आवश्यक सामंजस्य स्थापित कर सकेंगे। आज हमारे सम्मुख भौतिक जगत की अनेक ऐसी चुनौतियाँ खड़ी हैं, जिन्हें हमें खुद के साथ सामाजिक परिवेश की भलाई के लिये समाप्त करना है, लेकिन इन चुनौतियों से लड़ने की स्वाभाविक शक्ति का ह्रास भी हमारे भीतर से निरन्तर हो रहा है।

इन परिस्थितियों में मनुष्य प्राकृतिक व्यवस्था के अनुसार रहने के लिये थोड़ी-बहुत वैचारिक स्थिरता अपनाए और उसी के हिसाब से थोड़ा व्यवहार करे तो इस अभ्यास से भी हमें बहुत कुछ मिल सकता है। हम यदि एक परिवार का हिस्सा हैं, यदि हम किसी के अभिभावक हैं या किसी के बच्चे हैं, तो दोनों स्थितियों में हमारा उत्तरदायित्व बनता है कि हम अपने बड़े-बूढ़ों के साथ-साथ भावी पीढ़ी के लिये एक सुरक्षित मानसिक-भौतिक वातावरण बनाएँ।

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