मीठे शहद का कड़वा पहलू: मधुकोष से उपजता महा-अकाल -2 [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, प्रविष्टि – 21]steemCreated with Sketch.

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उदाहरणार्थ केलिफोर्निया में लग रही बादाम की खेती को लें। यहाँ 8,10,000 एकड़ में 9,07,20,000 बादाम के पेड़ हैं। प्रत्येक पेड़ से 7,000 बादाम मिलती है। इसके लिए 25.40 खरब फूलों का परागन करना होता है। अतः प्रति एकड़ कम से कम दो मधुमक्खियों के छत्तों के हिसाब से 16,20,000 छत्तों की आवश्यकता पड़ती है। यहाँ हर साल फरवरी के माह में 31 अरब मधुमक्खियाँ आती है और ऋतु के अंत तक इनकी संख्या 80 अरब तक पहुँच सकती है। एक क्षेत्र की केवल एक फसल के लिए मधुमक्खियों की आवश्यकता को बताने वाले इन आंकड़ों के माध्यम से आप इनकी महत्ता का अंदाज़ा लगा सकते हैं।

परन्तु सन् 2006 से लाखों मधुमक्खियों के रहस्यमय रूप से ओझल होने की घटनाएं देखने में आ रही हैं। मधुमक्खियाँ अचानक एक दिन अपने छत्तों में नज़र नहीं आती। ढूँढ़ने पर न तो उनकी लाशों का ही पता लग पाता है और न ही कोई और प्रमाण। इन रहस्यमयी घटनाओं के सिलसिले के जारी रहने को सी.सी.डी. लक्षण का नाम दिया गया है। “कॉलोनी कॉलेप्स डिसऑर्डर (सी.सी.डी.)” यानि मधुमक्खियों की पूरी की पूरी बस्तियों के ढ़हने का उपद्रव! यह एक बहुत ही गंभीर खबर है क्योंकि मधुमक्खियाँ हमारे अनाज, सब्जियों और फलों का परागन कर इनकी उपज में अहम् भूमिका निभाती है। बिना मधुमाक्खियों के तो सभी फसलें बेकार हो जायेगी! प्रतिवर्ष 30% से 90% तक मधुमक्खियों के छत्ते खाली मिलने की रिपोर्टें आई हैं। अतः वैज्ञानिक इसका कारण खोजने में लग गए हैं। जहरीले कीटाणुनाशकों का उपयोग, मोबाइल आदि उपकरणों के बढ़ते उपयोग से इलेक्ट्रो-मेग्नेटिक किरणों का फैलता विकिरण आदि पर मुख्यतः संदेह है। इज़राइल जैसे कुछ देशो ने तो दिन में कीटनाशक छिड़कना बंद कर दिया है। अब यह रात को किया जाता है, जब सारी मधुमक्खियाँ अपने छत्ते पर लौट चुकी होती है।

लेकिन अन्य पशु उत्पादों की तरह ही शहद भी मानव के लिए अनावश्यक ही है। प्रतिष्ठित आहार विशेषज्ञ बताते हैं कि शहद से कोई विशेष स्वास्थ्य-लाभ नहीं होता। इसमें मुख्यतः चीनी और बहुत थोड़े अंशों में कुछ विटामिन और खनिज होते हैं। शहद में लगभग 97 प्रतिशत सफ़ेद चीनी की ही तरह मीठास होती है। इसमें 80% साधारण चीनी होती है, मुख्यतः फ्रक्ट्रोज़ और ग्लूकोज़ और थोड़ी-सी मात्रा अन्य प्रकार की चीनियों की होती है, जैसे माल्टोज, सक्रोज़ और अन्य कार्बोहाईड्रेट। यह पेय, सक्रोज़ से कृत्रिम रूप से तैयार की जाने वाली चाशनी की ही तरह होता है। इसके अलावा, शहद का उत्पादन बढ़ाने के लिए पेशेवर मधुमक्खी-पालक मधुमक्खियों को सीधे ही चीनी का घोल पिला देते हैं। शहद में क्लोस्ट्रीडियम बोटुलिनम (बोतुलिज्म) नामक बीजाणु भी होते हैं जो कि अविकसित प्रतिरोधी क्षमता वाले शिशुओं के लिए प्राण-घातक हो सकते हैं। इसी कारणवश नवजात शिशुओं को शहद पिलाने से मना किया जाता है। कुछ ख़ास प्रकार के फूलों के पराग से तैयार हुआ शहद जहरीली प्रकृति का होता है, जिससे थकान, ऊंघ, कमजोरी, अधिक पसीना बहना, जी-घबराना, उल्टी आदि लक्षण देखने में आते हैं। शहद जहरीला होता है क्योंकि इसमें फोरमिक और मेनाईट एसिड होते हैं। मधुमक्खियाँ इन्हें तोड़ने के लिए जो एंजाइम स्रावित कर सकती है वो मानव का शरीर नहीं कर सकता। शहद में सबसे अधिक कैलोरी (65 कैलोरी प्रति चम्मच) होने से शक्कर की तुलना में इससे हमारे दांत जल्दी खराब होते हैं।

बोतलों में बंद शहद प्रसंस्कृत होता है। इसके लिए इसे पिघाला जाता है, छाना जाता है, गरम किया जाता है, पाश्चर्यकृत किया जाता है और स्वादिष्ट बनाने के लिए कई जड़ीबूटियों के साथ उबाला जाता है। कुल मिलाकर प्रसंस्करण से शहद की प्राकृतिक बनावट ही बदल जाती है। मधुमक्खी-पालक अपनी मधुमक्खियों को संक्रमण से बचाने के लिए अत्यधिक एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल करते हैं, जिनके अंश शहद में भी विद्यमान होते हैं। सितम्बर 2010 में किये एक परिक्षण में भारतीय बाजारों में उपलब्ध लगभग सभी शहद के ब्राण्डों में ओक्सीटेट्रासाइक्लीन (OTC), क्लोरामफेनिकोल, एम्पिसिलीन, युरोफ्लोक्सेसिन, एरिथ्रोमाइसिन और सिप्रोफ्लोक्सेसिन की काफी मात्रा मिली थी।

जब मधुमक्खियाँ हमें पोलिनेशन के माध्यम से सैंकड़ों प्रकार के खाद्य-पदार्थ खिलाती है, तो आखिर शहद में ऐसा क्या है जिसके कारण हम उसकी जान के पीछे पड़ गए हैं? स्पष्ट और खरे-खरे शब्दों में कहा जाये तो शहद मधुमक्खियों की करी हुई उल्टी के अलावा और कुछ नहीं। एक मधुमक्खी शहद बनाने के लिए कई बार फूलों से पराग पीती है और अपने शरीर के स्राव के साथ उसका वमन करती है, फिर उसे पीती है और इस क्रिया को कई बार दोहराती है। तो फिर शहद एक नहीं, अनेक बार की हुई मधुमक्खियों की उल्टियों का मिश्रण है! क्या आप उसको बड़े चाव से चाटते हैं?

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खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती में आगे पढ़ें, इसी श्रंखला का शेषांश अगली पोस्ट में।

धन्यवाद!

सस्नेह,
आशुतोष निरवद्याचारी

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