मुसाफिर
जाने कितनो ने लूटा उसे
वो मुसाफिर तो
किसी और देश का था..
दो पल ठहरा,
लुटा, बिका
रंक्तरंजित से कदमो से
चलता गया
अपनी मन्जिल की और..
बढता गया
सब कुछ खोकर भी..
उसे गम ना था
उसे खुशी ना थी
बेबस सा बढता चला
अकिंचन
निढाल सा
कुछ पाने को..
वो मुसाफिर
किसी और देश का था..
स्वरचित :- गौरव 'देव' शर्मा
wah wah kya baat
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