‌‌‌एक मेंढकों का राजा गंगदत्त रहते था। वह अपनी कूट नीति से काम करते था।

in #esteem2 years ago

‌‌‌किसी कुएँ में मेंढकों का राजा गंगदत्त नामक मेंढक रहता था। एक दिन की बात है। कि कुएँ में रहट के सहारे वह भी कुएँ से बाहर आ गया। उन दिनों उसे उकसे बंधु-बांधवों ने बहुत व्याकुल किया हुआ था। बाहर आने पर वह सोचने लगा कि किस प्रकार उनसे बदला लिया जा सकता है।

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वह इस विषय पर विचार कर ही रहा था कि उसने प्रियदर्शन नाम का एक कृष्ण सर्प को बिल में घुसते हुए देखा। उसे देखकर वह सोचने लगा कि क्यों न इस कृष्ण को कुएं में ले जाकर अपने उन शत्रुओं को विनाश ही करवा दूँ ? कहा भी गया है कि बलवान शत्रु के साथ किसी बलवान को ही भिड़ाकर उसका विनाश किया जा सकता है। इस प्रकार करने से अपना कार्य भी सिद्ध हो जाता है। और किसी प्रकार का कष्ट भी नही होता।
गंगदत्त सोच राह था कि पैर में गड़े काँटे को किसी दूसरो काँटे से ही निकाला जा सकता है। उसी प्रकार अपने सबल उग्र शत्रु को किसी उग्र और सबल के साथ भिड़ाकर ही बुदि्धमान व्यक्तिे उकसा उन्मूलन करना चाहिए।
यह सोचकर वह उस सर्प के बिल के समीप जाकर उसे बुलाने लगा। उसकी आवाज सुनकर प्रियदर्शन के अनुभव किया कि वह व्यक्ति तो उसकी जाति का है। नहीं। किंतु सर्प के अतिरिक्त इस लोक में मेरा किसी अन्य से परिचय नही है। तब बाहर जाने से पहले मुझे यह जान लेना चाहिए। कि यह बुलाने वाला कौन ? क्योंकि जिस व्यक्ति के स्वभाव, कुल और निवास का पता न हो, उसकेसाथ संपर्क स्थापित करने का प्रयास कम ही करना चाहिए।
इस प्रकार की बात विचारकर सर्प ने उससे पूदा, तुम कौन हो ?
मैं मेंटकों का रजा गंगदत्त हॅू। आपसे मित्रता करने के लिए आया हॅू।
प्रियदर्शन कहने लगा, यह कैसे हो सकता है? तृण भी क्या अग्नि के साथ मित्रता कर सकते है ? कहा भी गया है। कि जो जीव जिस जीव का वध्य होता है, वह कभी स्वप्न में भी उसके पास नही जाता है। तुम यह व्यर्थ की बात क्यों कर रहे हो ?
गंगदत्त कहने लगा, आप कहते तो ठीक ही है। आप हमोर स्वाभाविक शत्रु है। किन्तु इस समय मैं किसी अन्य शत्रु के तिरस्कार से दुखी और भयवीत हॅू। कहा भी गया है कि सर्वनाश की स्थिति में अथवा अपने प्राणों के विनाश-काल में मनुष्य को चाहिए कि वह आवश्यकतानुसार शत्रु की अधीनता स्वीकार करके भी अपने प्राण और धन की रक्षा करे।
सर्प ने पूछा, बोलो, किसने किया है तुम्हारा अपमान ?
मेंढक बोला, और किसी ने नहीं मेरे अपनों ने ही मेरा अपमान किया है।
तुम रहते कहां हो ? किसी बावली में , किसी कूप में किसी सरोवर में अथवा किसी झील में ?
में एक कुएँ में रहता हॅू।

देखो, हमारे पैर तो होते नही है, इसलिए मैं कुएं में प्रविष्ट नही हो सकता। और यदि सिकी प्रकार वहां प्रविष्ट हो भी गया तो वहाँ मेरे रहने के लिए कोई स्थान नही होगा। अत: यहाँ तुम्हारा इच्िछत बात सिद्ध नही होगा। अच्छा यही है। कि तुम यहाँ से चले जाओ।
किसी ने ठीक ही कहा ह कि ऐश्वर्य को चाहने वाले व्यक्तिे चाहिए कि वह उसी वस्तु को खाए, जिसे खाना उसके लिए शक्य हो और उसके पेट में पहुँचकर जो वस्तु पच जाए तथा परिणाम में हितकारक भी हो।
यह सुनकर मेंढक बोला, महाशय¡ आप चले तो आइए मै बड़ी सरलता से उस कुआ में आपको प्रविष्ट करा दूंगा। वहाँ जल के छोर के एक रमणीय कोटर भी है। उसमें रहकर आप अनायास ही अपना पेट भर सकेंगे।
उसकी बात सुनकर सर्प सोचने लगा कि वह वृद्ध हो चला है। कभी संयाग से ही कोई चूहा उसके मुख में फँस पाता है। इस कुल का नाश करने वाला ने मेरी जीविका का बड़ा ही सुखकर उपाय बताया है। मुझे वहाँ चले जाना चाहिए। किसी ने ठीक ही कहा है कि जिस व्यक्ति की शक्ति कमजोर हो चुकी है। और उसका कोई साहयक भी न हो तो उसे व्यक्ति को चाहिए। कि वह अपनी जीविका के लिए अत्यंत मुखप्रद और सरलतम उपाह का ही चयन करे, यही बुद्धिमत्ता है।
यह विचार कर उसे गंगदत्त से कहा, ठीक है, तुम आग आगे चलो, मैं तुम्हारे साथ आता हॅू।
यह सुनकर मेढ़को कहने लगा, ठीक है चलते है। मै आपको बड़े सुख से वहॉ ले जाऊँगा, वहाँ रहने के लिए रम्य स्थान भी दूंगा और नित्य के भोजन का भी खुलकर प्रबंध होगा। किंतु मेरा एक आग्रह मानना होगा।
वह क्या ?
वह यह कि आपको मेरे परिवार वालो की रक्षा करनी होगा। मै जिन-जिनको तुम्हे कहॅू, केवल उन्हे ही मारकर
आगे की कहानी अगले हफ्ते शुरु होगी।

There was a frog called King Gangdutt of frogs in some wells. Its just matter of one day. With the help of Rahat in the well, that too came out of the well. In those days, he was very disturbed by the unbridled brothers and sisters. On coming out, he started thinking how he could be revengeed.
He was contemplating on the subject that he saw a Krishna snake named Priyadarshan going inside the bill. Seeing him, he started thinking, why not take this Krishna into the well and let him destroy these enemies? It has been said that a strong man can be destroyed by destroying a strong man. By doing this your work also gets proven. And there is no pain in any kind.
It was a tragic thought that the thorn in the foot could be removed from someone else's thorn. In the same way, by eliminating a strong and aggressive enemy with a strong and powerful, eradicating intimidation by the intellectuals should be eradicated.
Thinking about this, he approached the snake's bill and started calling it. Listening to his voice, Priyadarshan realized that the person is of his caste. No. But besides this serpent I am not familiar with any other people in this world. Then I should know this before going out. Who is this caller? Because the person's nature, total and residence is not known, efforts should be made to reduce contact with him.
Considering this type of thing, the serpent is totally different from him, who are you?
I have gone missing from the house. Came to befriend you
Priyadarshan said, how can it be? Can the tray also be friends with fire? It has also been said. The creature that is alive, does not go to him even in a dream. Why are you talking this in vain?
Gangadatta said, you say okay. You are natural enemies of Hamor. But at this time I am sad and frightened of the hatred of any other enemy. It has also been said that in the event of an annihilation or in the destruction of their lives, humans should save their life and wealth by accepting the subjugation of the enemy as per their requirement.
The serpent asked, tell me, who has humiliated you?
Frogs have spoken, and no one has insulted me by my own people.
Where do you live? In a bowl, in a well in a lake or in a lake?
I live in a well.
Look, we do not have feet, so I can not enter the well. And if there were some sort of entry there then there would not be any place for me to stay. So here your preference will not be proved. That's good. That you go from here
Someone rightly said that those wishing for the aspiration should eat that item, which is possible for him to eat and after reaching his stomach, whatever is digested and also beneficial in the result.
When you heard this, the frog said, monsieji, if you go, come, I will easily put you in that well. There is also a delightful coater of water end. By staying in it you will be able to fill your stomach in a spontaneous manner.
The sarp began to think that he was old. Sometimes a mouse gets trapped in his face. The destroyer of this total has described the great happiness of my life. I should go there. Someone rightly said that the person whose power has weakened. And if he does not have any support, then he needs the person. That is the wisdom that he selects the most formidable and simplest consolation for his sustenance.
Thinking about it, said to Gangadatta, okay, you go ahead with fire, I come with you.
Hearing this, the ram began to say, it is okay to walk. I will take you with great pleasure, I will also have a pleasant place to stay there and the daily meal will be openly arranged. But I have to be a solicitation.
That what ?
It is that you have to protect my family. I say to you, only by killing them

It shows you in Your farm. How do you like the farm See pictures and tell.
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Enjoy your Friday.
Have a good day.


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(We are very grateful to this. And you continue to have success)

(Deepak Kumar Ahlawat)

@ahlawat


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