खून और शोषण का असली कारण: प्रजातिवाद - 3 [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, प्रविष्टि – 19]steemCreated with Sketch.

in LAKSHMI2 years ago (edited)

जीवों को भगवान ने हमारे खाने के लिए ही बनाया है!

इस तरह की बेहूदा बात करने वालों के पास कोई तर्क नहीं होता। बस वह अपना पक्ष मजबूत करने के लिए इस तरह के मनगढ़ंत सिद्धांत रचते रहते हैं। हमारा इस धरती पर अन्य जीवों के साथ सह-अस्तित्व है अर्थात सभी जीव हमारे साथ-साथ यहाँ रहते हैं। इसका अर्थ कतई यह नहीं निकलता कि वे सभी जीव “हमारे लिए” यहाँ रहते हैं।

दुनिया में सबका निरवद्याहारी या विशुद्ध शाकाहारी होना संभव नहीं है!
“यदि दुनिया में सभी निरवद्याहारी हो जाए तो दुनिया में पशुओं की बढ़ती जनसंख्या से हम परेशान हो जायेंगे, वहीँ सबके लिए अनाज कम पड़ जायेगा!”, ऐसा कहने वालों को तथ्यों का यथार्थ ज्ञान ही नहीं होता। हमारे भोजन के लिए पशु कुदरती रूप से पैदा नहीं होते, उन्हें तो विशेषकर हमारे लिए “तैयार” किया जाता है। आज हमारी मांग के कारण ही अरबों-खरबों जानवरों की प्रतिवर्ष “खेती” होती है। उनको जबरन कृत्रिम रूप से प्रजनन कर अस्तित्व में लाया जाता है और आजीवन शोषण कर निर्ममता से मौत के घाट उतारा जाता है।

यदि दुनिया में सभी निरवद्याहारी हो जायें, तो किसी भी जीव की “खेती” या जबरन प्रजनन करने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। व्यवसाय का सिद्धांत है कि मांग के अनुसार आपूर्ति बढ़ाई जाती है। यदि मांग घटेगी तो आपूर्ति भी घटेगी। यदि मांग खत्म हो जायेगी तो समाज को इन अनावश्यक व्यवसायों से भी निजात मिल जायेगी।

सबके निरवद्याहारी हो जाने पर लोग अनाज की कमी से भूखे मरने लगेंगे!
कई माँसाहारियों को मैंने ऐसा कहते हुए सुना है, “आपको हमारी मेहरबानी से तो अनाज नसीब होता है, आपको तो हमारा आभारी होना चाहिये। यदि हम सब निरवद्याहारी हो जायें तो दुनिया में अनाज की कमी हो जायेगी।” बेचारे ये लोग नहीं जानते कि इनके द्वारा खाये जाने वाले जानवरों को सिर्फ हवा खिलाकर बड़ा नहीं किया जाता। अपितु इनको खिलाये जाने वाले उच्च गुणवत्ता के मक्का और सोयाबीन उगाने के लिए दुनिया की कुल खेती की लगभग आधी ज़मीन इस्तेमाल की जाती है। दूसरे, फूड-चैन में आप जितना पीछे खिसकेंगे, उतनी ही ऊर्जा की हानि होगी। एक किलोग्राम माँस तैयार करने के लिए औसतन दस किलोग्राम अनाज जानवर को खिलाना पड़ता है। अतः भोजन-अपर्याप्ति की समस्या का कारण तो माँसाहार है न कि निरवद्याहार। उल्टा चोर कोतवाल को डांटने चला!

सभी के निरवद्यता को अपनाने पर माँस से जुड़े उद्योगों के लोग बेरोजगार हो जायेंगे!
क्या कंप्यूटर के आने से टाइपराईटर चलाने वाले बेरोजगार नहीं हो गए? क्या डिजिटल कैमरे के आने से पुराने रील वाले कैमरे से जुड़े व्यवसाय बंद नहीं हो गए? यह तो व्यापार का सिद्धांत है कि बाज़ार में मांग के अनुरूप उनको ढ़लना ही पड़ता है, नहीं तो बाज़ार उन्हें खुद बाहर कर देता है। उपभोक्ता तो अपने पैसे को कहीं न कहीं खर्च करता ही है। वह जहाँ भी अपना धन व्यय करता है, वहीँ व्यवसाय के नए अवसर उत्पन्न हो जाते हैं। अतः यह व्यर्थ की सहानुभूति जताने वाले लोग या तो व्यापार के आधारभूत सिद्धांत को नहीं समझते या फिर अपने आचरण का बचाव करने के लिए अपने आपको जानबूझकर धोखे में रखना चाहते हैं।

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खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती में आगे पढ़ें, इसी श्रंखला का शेषांश अगली पोस्ट में।

धन्यवाद!

सस्नेह,
आशुतोष निरवद्याचारी

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