Ek Gazal

in #poetry8 years ago

ग़ज़ल

यूँ तो तमाम रात मुझे बेख़ुदी रही ।
लेकिन क़माल दर्द की चारागरी रही ।

क्या-क्या नहीं था दीद को लेकिन ये मेरी आँख ,
देखा उसे तो सिर्फ़ उसे देखती रही ।

इक मैं था एक वो था नहीं और था कोई ,
फिर उसके बाद सिर्फ़ वहाँ ख़ामुशी रही ।

जो भी मिला उसी को गले से लगा लिया ,
यूँ भी कहाँ किसी से मेरी दुश्मनी रही ।

यूँ तो नहीं भरोसा यहाँ एक पल का भी ,
फिर से मिलेंगे तुमसे अगर ज़िन्दगी रही ।

उसको ही सिर्फ़ आया नहीं मुझपे ऐतबार ,
वैसे तो सबके साथ मेरी दोस्ती रही ।

'नादान' उसने छोड़ दिया उस सवाल पर ,
फिर तो तमाम रात मेरी मयक़शी रही ।

                                        राकेश 'नादान'

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