Ek Gazal
ग़ज़ल
यूँ तो तमाम रात मुझे बेख़ुदी रही ।
लेकिन क़माल दर्द की चारागरी रही ।
क्या-क्या नहीं था दीद को लेकिन ये मेरी आँख ,
देखा उसे तो सिर्फ़ उसे देखती रही ।
इक मैं था एक वो था नहीं और था कोई ,
फिर उसके बाद सिर्फ़ वहाँ ख़ामुशी रही ।
जो भी मिला उसी को गले से लगा लिया ,
यूँ भी कहाँ किसी से मेरी दुश्मनी रही ।
यूँ तो नहीं भरोसा यहाँ एक पल का भी ,
फिर से मिलेंगे तुमसे अगर ज़िन्दगी रही ।
उसको ही सिर्फ़ आया नहीं मुझपे ऐतबार ,
वैसे तो सबके साथ मेरी दोस्ती रही ।
'नादान' उसने छोड़ दिया उस सवाल पर ,
फिर तो तमाम रात मेरी मयक़शी रही ।
राकेश 'नादान'