Ek ghazal
धूप में आकर वही टकरा रहा है,
मुझसे आगे मेरा साया जा रहा है.
कर लिया है उसने दरियाओं पे क़ब्ज़ा,
कतरे-कतरे के लिए तरसा रहा है.
क़ैद है मुझमें भला मौसम ये कैसा,
आ रहा है ना कहीं ये जा रहा है.
साथ ख़ुद का छोड़ कर जाऊं मैं कैसे,
दिल बहुत बेचैन है,घबरा रहा है.
इश्क़ तो हरगिज़ नहीं है वो यक़ीनन,
दिल अगर करके उसे पछता रहा है.
क़त्ल करना ही अगर मकसद है तेरा,
मार भी दे,क्यूँ मुझे तड़पा रहा है.
लौट कर आ तो सही फिर देख तू भी,
घर तेरा मेरी ही ग़ज़लें गा रहा है.