Ghazal

in #prameshtyagi8 years ago

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एक ग़ज़ल आप सब की नज़र...

ख्वाब में ही बस खुशी की दीद है,
जिन्दगी इक ख़ुशनुमा उम्मीद है

टूटे-फूटे कुछ दिये ही बस नसीब,
अपनी किस्मत में कहां ख़ुर्शीद है

मौत से मिलकर ही सब ग़म होंगें दूर,
बस यही अब आखिरी उम्मीद है

ज़ेब में पैसे न दिल में कोई लुत्फ,
कैसे कह दूँ , आज रोजे - ईद है

जाने कब कैसे बदल जाए नसीब,
क्यूँ 'रिशू' इतना तू ना-उम्मीद है

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