सिद्धांत
नमस्कार दोस्तों
जीवन के लिये संघर्ष,
हम सभी नें देखा हैं, कि कमजोर जानवर को ताकतवर जानवर मारकर अपना जीवन यापन करते हैं। किसी भी बड़े पेड़ के नीचे कभी छोटे पेड़ नही पनप सकते। प्रत्येक गली पर वहां के कुत्तो का आधिपत्य होता हैं, दुसरे कुत्तो का वहां आना उनको नही सुहाता, और यदि उस गली के कुत्ते कमजोर हैं, और जो वहां जमने के लिये आये हैं, वो ताकतवर हैं, तो उस गली के कुत्तो को या तो भगा दिया जाता हैं, या मार दिया जाता हैं।
क्या जीवन के लिये वैसा ही संघर्ष मानव जाती में भी मिलता हैं?
शायद आप सभी का जवाब हाँ में ही होगा।
कुछ ताकतवर पूंजीपति अपनी पूंजी के बल पर और पूंजी की सहायता से प्राप्त राजनेतिक ताकत की सहायता से बहुत से मजदूर वर्ग का उपयोग कर अपनी तिजोरियों में बहुत से लोगो के हिस्से का धन जमा कर लेते हैं। उसी धन की सहायता से बहुत से लोगो को कमजोर कर उनकी जिन्दगी नरकमय बना देते हैं। विश्व के बहुत से देश जो शक्ति संपन्न हैं, अन्य अविकसित या विकासशील देशों को बहुत से हतकंडे काम में लेकर अपना मोहताज बनाये रखते हैं। और उनके विकास में बाधाएं उत्पन्न करते रहते हैं।
इस प्रकार ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनके आधार पर हम ये कह सकते हैं, कि मानव में भी आदि सभ्यता से लेकर वर्तमान युग तक मानव सभ्यता में भी जीवन के लिए संघर्ष विद्यमान रहा हैं।
फिर दया भावना, सहयोग आदि के कारण अन्य जीवों से मानव जाति बेहतरीन हैं। बहुत से ऐसे उदहारण भी मिलते हैं, जिसके आधार पर बहुत से ऐसे लोग भी हैं, जो गरीब और असहाय लोगों के जीवन को बेहतरीन बनाने के सतत प्रयासों में लगे हुए हैं।
यदि हम मानवीय गुणो को धारण किये बिना, जीवन जी रहे हैं, तो हमारा जीवन किसी पशु के समान ही हैं, जो सिर्फ अपने बारे में ही सोचता हैं, सिर्फ अपना पेट भरने की ही चिंता करता है।
प्रकृति भी उसी मानव का सहयोग करने को तत्पर रहती हैं, जो मानवीय गुणो को सर्वोपरि मानते हुए अपना जीवन जीते हैं। हमारे धर्म और संस्कार भी हमें मानवीय संवेदनाओं को समझ कर उनको महत्व देते हुए जीवन यापन की सद्प्रेरणा देते हैं।
लौकिक दृष्टी से भी सोचा जाय तो, स्वार्थी बनकर धन चाहे कितना ही इकट्ठा कर लो, मर जाने के पश्चात वो धन लडाई का कारण बनता हैं, और परिवार बिखर जाता हैं। जबकि अपनी जरूरतो को पूरा करते हुए, शेष धन को परमार्थ में लगया जाय,तो मरने के बाद भी लोगो के दिलो में सम्मान मिलता हैं, परिवार में भी अच्छे संस्कारों का पदार्पण होता हैं, और एक बेहतरीन जीवन पीढियों तक लगातर चलता हैं।
अपने देश के या समाज के महापुरुषों के जीवन से हम प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं, जिनके पास अपना कुछ भी नही था, पर उनका जीवन समाज के कमजोर और पिछ्ड़ो को समर्पित रहा। कई पीढियों के गुजर जाने के बाद भी उनके परिवार को आज भी सम्मान मिलता हैं।
सिर्फ नजरिये का फर्क हैं, महान सोच देश, धर्म, जाति आदि के बंधनो से बहुत उपर उठ जाती हैं। महान विचारों को किसी भी बन्धन में बान्ध पाना असम्भव हैं। सोच के बदलते ही जीवन बदल जाता हैं।
कितना भी कर लो, जीवन के दिन गिनती के हैं, एक दिन समाप्त होने निश्चित हैं। पैदा हुए तब न कुछ ले कर आये थे, न जाते समय कुछ ले जा पाओगे। जब ये कटुसत्य हैं, तो फिर किसलिए इकट्ठा करना, किसके लिये ?
जो भी पैदा होता हैं, वो पेट को भरने के लिये दो हाथ लेकर पैदा होता हैं।
किसी म्हापुरुष नें कहा भी हैं-
" पूत सपूत, तो क्यों धन संचे,
पूत कपूत, तो क्यों धन संचे।।"
अर्थात कितना भी धन संचय कर लो, यदि आनेवाली पीढ़ी सपूत होगी, तो उनको आपके कमाए हुए धन की आवश्यकता नही होगी, वो स्वयं कमा लेंगे। और यदि आनेवाली पीढी कपूत होगी तो कितना भी संचय कर लो, वो उसका दुरुपयोग ही करेंगे और जल्दी ही खत्म भी कर देंगे।
" चिड़ी चोंच भर ले गयी,
नदी न घाटियो नीर।
दान दिया धन न घटे,
कह गये सन्त कबीर।।"
अपना जीवन बेहतरीन कैसे होगा, इसका निर्णय करने से पहले हमें किसी शोध की आवश्यकता नहीं होती। क्योँकि हमसे पहले बहुत से यहाँ, हमसे बहुत बेहतरीन और बहुत सी किस्म के जीवन जी चुके हैं। उनको देखकर हम अपने लिये उचित अनुचित का निर्णय कर सकते हैं।
जीवन आपका,
निर्णय भी आपका।
उचित निर्णय आपको हजारो वर्षो तक लोगो के दिलो में जिन्दा रखेगा, अनुचित निर्णय जीवित रहते हुए भी जीवन का आनन्द समाप्त कर देगा।
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