क्षत्रिय ~ राणा सांगा

in #partiko8 years ago


अस्सी घाव लगे थे तन पे ।
फिर भी व्यथा नही थी मन में ।।

भक्त शिरोमणि,मीरां के ससुर, मेवाड़ राज्य के सबसे कुशल क्षत्रिय शासक राणा सांगा, जिनका पूरा नाम संग्राम सिंह था। राणा रायमल के बाद मेवाड़ की राजगद्दी सम्भालने के बाद राणा सांगा को जीवन भर युद्ध में रत रहना पड़ा, फिर भी इनके शासन काल मे मेवाड़ राज्य अपनी समृद्धि के सर्वोच्च शिखर पर था।
चारो ओर मुगलो से घिरे मेवाड़ को न सिर्फ बचाया बल्कि, समस्त हिन्दू शासको को एकत्रित करने का महत्वपूर्ण प्रयास किया। जब जब किसी हिन्दू राज्य को सहायता की आवश्यकता पड़ी, राणा सांगा ने सहायता की।
राणा सांगा ने अपने जीवन में बहुत से युद्ध लड़े। जिनमे से कुछ प्रमुख युद्ध निम्न हैं-
ईशा 1517 में सुल्तान इब्राहिम लोदी से खतौली का युद्ध, जिसमे इब्राहिम लोदी बुरी तरह से हारकर भगा।
गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर ईडर,अहमदनगर ओर बीसलनगर में परास्त किया व रायमल राठौड़ को ईडर का शासक बनाया
अहमदनगर के किले को तोड़कर मुगल सेना को बुरी तरह पछाड़ा, और भगाया। इस युद्ध मे क्षत्रिय शासक डूंगर सिंह बुरी तरह से घायल हुए और उनके पुत्र कान्ह सिंह का शौर्य तो ये मातृभूमि कभी भूल ही नही पाएगी। मुगल अहमदनगर के किले में बंद होकर युद्ध कर रहे थे, अनेको प्रयासों के बावजूद अहमदनगर के किले का दरवाजा नही टूट रहा था। उस पर बड़े बड़े भाले लगे होने के कारण हाथी वार नही कर पा रहे थे, तब कान्ह सिंह ने दरवाजे पर खड़े होकर महावत से कहा, अब हाथी से मुझ पर वार करवाओ, कान्ह सिंह दरवाजे पर होने के कारण भाले हाथी को दिखे नही, ओर हाथी ने कान्ह सिंह पर जोर से वार कर दिया। कान्ह सिंह वहीं पर मातृभूमि के लिए सहीद हो गए, पर किले का दरवाजा टूट गया और क्षत्रिय राणा सांगा की सेना ने किले में घुसकर मुगलो को बुरी तरह से मारा।
मांडू के सुल्तान महमूद के साथ विक्रम संवत 1576 में युद्ध हुआ, इस युद्ध मे राणा सांगा गागरोन के राजा की सहायता के लिए गए, ओर सुल्तान महमूद को बंदी बना लिया। इसको मेवाड़ के किले में कैद रखा, घायल था इलाज करवाया। बाद में सुल्तान द्वारा राणा की अधीनता स्वीकार कर लेने के कारण उसको ससम्मान बन्दी से मुक्त कर पुनः मांडू का सुल्तान बना दिया।
बाबर से युद्ध से पूर्व राणा सांगा ने यू तो कई लड़ाईया लड़ी, पर 18 बड़े युद्ध दिल्ली व मालवा के सुल्तानों से लड़े और सबमे विजयी रहे।
मांडू के सुल्तान व मालवा के सुल्तान को बंदी बनाने के बावजूद उसे पुनः छोड़ देना राणा की सहृदयता की निशानी हैं, क्योकि क्षत्रिय शासक कभी अनीति या छल कपट नही करते और न ही अधर्म पूर्वक युद्ध करते और न किसी के राज्य पर कब्जा करते।
बाबर से युद्ध से पूर्व राणा की एक आंख, एक हाथ और एक पैर उनका साथ छोड़ चुके थे।
इतना सब होने के बावजूद, ये क्षत्रिय शासक उस समय के सबसे शक्तिशाली बादशाह बाबर से युद्ध ठान बैठे और 17 मार्च 1527 को खानवा का युद्ध हुआ। इस युद्ध से राणा सांगा एक अखण्ड हिन्दू साम्राज्य की स्थापना करना चाहते थे, पर कुछ गद्दारो के कारण राणा सांगा युद्ध मे घायल हो गए और राणा को हार का मुहँ देखना पड़ा।
कहा जाता हैं, राणा सांगा के शरीर पर 80 घाव थे। विश्व में इस दूसरा कोई उदाहरण नही मिलता, जहाँ किसी शासक के शरीर पर 80 घाव लगे हो, एक आंख खत्म हो चुकी हो, एक हाथ कट चुका हो, एक पैर बेकार हो चुका हो और फिर भी वो शासक स्वयं युद्ध करने के लिए मैदान में उतरा हो।
ऐसे थे क्षत्रिय शासक राणा सांगा, जो 1509 से 1527 तक मेवाड़ के सबसे शक्तिशाली, बहादुर और कुशल शासक रहे ।
आज समूचा भारत इनके शौर्य और वीरता को नमन करता हैं।

क्षत्रियत्व पर आधारित इस विचारधारा पर आपके विचार सादर आमंत्रित हैं। upvot जरूर करें।

आपका ~ indianculture1

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