*दवाइयों के नाम पर अस्पतालों और फार्मा कंपनियों का खेल, इस तरह लुट रहे आप*
New Delhi: देश भर के अस्पतालों में मरीजो की जान बचाने के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाइयों पर कंपनियों, अस्पतालों और मेडिकल स्टोर का खेल जानकर आपके पैरों तले जमीन खिसक सकती है।
दरअसल, एक ताजा रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें दवाओं के दामों पर बड़ा खुलासा हुआ है। दवाएं बनाने वाली कंपनी आपको किस हद तक लूट रही है, ये आपको इस रिपोर्ट से पता चल जाएगा।
दरअसल, इंडिया टुडे ग्रुप की इस रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के सबसे बड़े अस्पतालों में शूमार दिल्ली के ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) में हर दिन हजारों की संख्या में मरीजों का इलाज होता है। अस्पताल के बाहर सैकड़ों की संख्या में दवाइयों की दुकाने हैं, जहां से लाखों-करोड़ों की दवाएं मरीजों के लिए जाती है। यहां बमुश्किल मरीज के घरवालों को 5 से 10% का डिस्काउंट मिलता है, जबकि यही दवाएं अस्पताल को आधे से भी कम दामों पर बेची जाती हैं।

अस्पताल और फार्मा कंपनियों का ये खेल मरीजों की जेब पर डाका डाल रहे हैं। मिसाल के तौर पर एमक्योर फार्मा की Temcure 250 mg नाम की दवाई अमृतसर के एक कैंसर अस्पताल को सिर्फ 1,950 रुपए में बेची गई है, जबकि मेडिकल स्टोर से यही दवा खरीदने पर 18,647 रुपए चुकाने पड़ेंगे। इसी तरह Pemcure 500 mg नाम की दवा मरीज को 16,500 रुपए में जबकि अस्पताल को सिर्फ 3,190 रुपए में बेची जा रही है।

इसी तरह रिलायंस लाइफ साइंस द्वारा विकसित की गई कैंसर की दवाओं में भी बड़ा झोल है। कंपनी द्वारा बनाई गई TrastuRel 440 mg अस्पताल को 30,875 रुपए में उपलब्ध कराई जा रही है, जबकि इस दवाई को खरीदनें में मरीज को 58,602 रुपए खर्च करने पड़ते हैं। एक अन्य दवा RituxiRel 500 mg का MRP 36,916 रुपए है, जो अस्पतालों को सिर्फ 14,970 रुपए में बेची जा रही है।

कैंसर के अलावा हार्ट सर्जरी के दौरान इस्तेमाल होने वाली दवाओं के दाम आपके होश उड़ा देंगे। हार्ट सर्जरी के दौरान anti-coagulant के तौर पर इस्तेमाल होने वाली दवा Retelex 18mg का MRP 32,700 रुपए है, जबकि यह दवा अस्पतालों को सिर्फ 18,000 रुपए में बेची जा रही है। इसी तरह Eptifab 100ml का MRP 12,331 रुपए है जो अस्पताल को सिर्फ 3,500 रुपए में बेची जाती है।

इंडिया टुडे ने इस रिपोर्ट में कुछ और चौंकाने वाले खुलासे किये हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मंहगी दवाएं सिर्फ प्राइवेट ही नहीं बल्कि सरकारी अस्पतालों को भी इसी दाम में बेची जाती हैं। फार्मा कंपनियों से जुड़़े कुछ लोगों ने बताया है कि अस्पताल इन दवाओं को अधिक मात्रा में खरीदते हैं, इसीलिए कंपनियां इन्हें सस्ते दामों पर बेचती हैं। रिपोर्ट में आगे कहा गया है, फार्मा कंपनियों के प्रतिनिधि अस्पतालों में डॉक्टरों से जाकर मिलते हैं और उन्हें अपनी दवाएं बेचने के लिए कहते हैं। बदले में डॉक्टरों को भारी डिस्काउंट का लालच दिया जाता है। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में फार्मा कंपनियों की लूट और मेडिकल करप्शन की पड़ताल करने वाली एक एनजीओ का कहना है कि पूरी फार्मा इंडस्ट्री की 25% कमाई का हिस्सा मेडिकल करप्शन, डॉक्टरों, ब्यूरोक्रेट्स और नेताओं को जाता है।

पिछले कुछ समय में मोदी सरकार ने डॉक्टरों से जेनरिक दवाओं को बेचने के लिए प्रेरित करने का अभियान शुरू किया है, लेकिन डॉक्टरों और फार्मा कंपनियां मिलकर ऐसा नहीं होने देती। कुछ डॉक्टरों और फार्मा एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर हम जेनरिक दवाओं को बड़े स्तर पर बेचना शुरू कर देंगे तो आने वाले समय में फार्मा इंडस्ट्री डूबने की कगार पर आ जाएगी और आगे कोई शोध नहीं हो पाएगा।